संयुक्त अरब अमीरात के अंतरिक्ष यात्री सुल्तान अल नेयादी ने अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन से बाहर निकलकर अंतरिक्ष में कुछ समय बिताया। इस उपलब्धि को देखते हुए कहा जा रहा है कि अरब ने इतिहास रच दिया है। यह उपलब्धि अरब देशों के लिए सुखद और अनुकरणीय है। सुल्तान अल नेयादी दो महीने के लिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र गए हुए हैं। नेयादी अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की मदद से अंतरराष्ट्रीय स्पेस सेंटर गए हुए हैं। उनके साथ नासा के अंतरिक्ष यात्री स्टीफन बोवेन भी अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र गए हुए हैं। नेयादी का स्पेस वॉक इस मायने में काफी महत्वपूर्ण है कि अरब देशों की तरफ से वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने स्पेस वॉक किया है। स्पेस वॉक काफी कठिन और जोखिम भरा कार्य है। इस स्पेस वॉक के लिए जो परिधान पहनने होते हैं वो काफी भारी होते हैं। पृथ्वी पर उस परिधान का वजन 145 किलो होता है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस परिधान को पहनकर नेयादी ने जो उपलब्धि हासिल की है, उसके पीछे उनका हौसला, उत्साह और दृढ़ इच्छाशक्ति का हाथ कितना ज्यादा होगा ? वाकई वह तारीफ के काबिल हैं। सुल्तान अल नेयादी अंतरिक्ष में चलने वाले पहले अमीराती, पहले अरब और पहले मुस्लिम हैं। यदि अरब लोगों के मनोविज्ञान की बात की जाए तो अरब के लोग विज्ञान में उतनी दिलचस्पी नहीं लेते हैं। उनका ज्यादातर समय आपसी लड़ाई-झगड़े और खून-खराबे में बीतता है। ऐसे में संयुक्त अरब अमीरात की तरफ से यह पहले पूरी दुनिया को चौकाता है। संयुक्त अरब अमीरात का अंतरिक्ष यात्री अमेरिका के लिए उपयोगी साबित हो रहा है। सुल्तान अल नेयादी का यह स्पेस वॉक काफी महत्वपूर्ण है। इसके जरिए अंतरिक्ष स्टेशन की बिजली उत्पादन प्रणाली को उन्नत करने और एक प्रमुख संचार उपकरण को फिर से प्राप्त करने का मकसद है। नेयादी और बोवेन अंतरिक्ष स्टेशन में शोध के लिए गए हैं। जिसमें वे सफल हो रहे हैं। उनकी सफलता कई देशों के वैज्ञानिकों को प्रेरणा देने का काम करेगा। खासकर अरब के लोग अब विज्ञान में दिलचस्पी लेना शुरू करेंगे और पश्चिमी देशों की तरह वे भी कामयाबी की नई इबादत लिखेंगे।
Monday, May 1, 2023
Sunday, March 18, 2018
जरा तस्वीर बदलने दो
अब मुझे तन्हा रहने दो ।
बस यही गुजारिश है।।
थोड़ी जिंदगी को समझ लूं।
बस यही ख्वाहिश है।।
मैंने बेबसी लाचारी देखी बहुत।
अब मुस्कुराने की मोहलत दे दो।।
रिश्तों से जब दर्द रिसने लगे।
तो आंखों से आंसू बहने दो।।
जख्मों को करवट बदलने दो।
जरा तस्वीर बदलने दो।।
Sunday, December 17, 2017
नोएडा में गंदगी
नोएडा सेक्टर-3 में ऊंची-ऊंची कई बिल्डिंग और अच्छी सड़कों के बीच जब ये तस्वीर दिखती है तो ऐसा लगता है कि गंदगी से हमारा नाता कभी खत्म नहीं होने वाला। महंगी गाड़ियों से गुजरने वाले लोग हो या फिर मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले लोग। सभी के लिए ये गंदगी परिचय की मोहताज नहीं। इस गंदगी में मवेशी अपनी भूख मिटाते हैं तो वहीं इंसान इस गंदगी में अपनी इच्छाशक्ति को ढूढता है। इंसान तो आखिर इंसान है। उसका अतीत इसी गंदगी से गुजरा है। ऐसे में वो इसमें रचे-बसे होने का मोह कैसे छोड़ दे? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल किले की प्राचीर से ऐलान करते हैं कि पूरे देशवासियों को गंदगी से लड़ना है। इस बीमारी को देश से जड़ से खत्म कर देना है। मगर इस ऐलान का हश्र ये तस्वीर बयां कर रही है। माना कि प्रधानमंत्री की पहल पर लोगों के बीच गंदगी के खिलाफ थोड़ी जागरूकता आई है, लेकिन ये नाकाफी है। दिल्ली और एनसीआर की जब ये हालत है तो देश के दूसरे शहरों की क्या हालत होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। खैर भारत सरकार का स्वच्छता अभियान तारीफ के काबिल वाला कदम है। इसे सभी देशवासी अपना समर्थन दें। लेकिन इससे भी अहम बात जो ये तस्वीर कह रही है। उसे नोएडा प्राधिकरण के अधिकारी जरूर मंथन करें। Wednesday, December 13, 2017
मेरी मौत चाहते हो तुम !
मेरी परछाई से मारपीट करते हो तुम ।
मेरी आत्मा पर जुल्म करते हो तुम ।।
मेरी हर सड़क पर टकराते हो तुम।।
मेरी आजादी का अतिक्रमण करते हो तुम।
मेरी हर खुशी और उमंग से जलते हो तुम।
कायर और बेईमान की मूरत हो तुम।।
मेरी आंखों में आंसू चाहते हो तुम।
आह! मेरी मौत चाहते हो तुम।।
Thursday, November 30, 2017
कब तक 'बेपटरी' चलेगी भारतीय रेल ?
ठंड का असर कह लीजिए या फिर रेलकर्मियों की लापरवाही, भारतीय रेल पटरी पर सरपट नहीं दौड़ पा रही
है। ट्रेन के पटरी से उतरने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यहां तक कि तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रेल दुर्घटनाओं को लेकर नैतिकता के आधार पर रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। पीयूष गोयल को नया रेल मंत्री बनाया गया, लेकिन हादसों का सिलसिला नहीं थमा। चाहे बास्को डी गामा पटना एक्सप्रेस ट्रेन हो या फिर कलिंग उत्कल एक्सप्रेस, इन हादसों से न तो रेल प्रशासन और न तो सरकार ने सबक सीखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की दोस्ती जगजाहिर है। बुलेट ट्रेन का सपना साकार करने के लिए 1 लाख करोड़ से ज्यादा की राशि लगाई जा रही है। इसमें जापान ने बुलेट ट्रेन के लिए भारत को 88 हजार करोड़ की राशि कर्ज के रूप में दी है जिसका ब्याज वो 15 साल के बाद 0.1 प्रतिशत के हिसाब से वसूलेगा। इस कर्ज को भारत 50 साल में चुकाएगा। इतनी मदद मिलने के बाद पीएम मोदी ने अहमदाबाद से मुंबई के लिए बुलेट ट्रेन की नींव रख दी। मगर बड़ा सवाल यही है कि बुलेट ट्रेन लाने वाले मोदी जी देश में हो रहे रेल हादसों पर लगाम नहीं लगा पा रहे हैं, ऐसे में उनकी बुलेट ट्रेन यदि पटरी से उतरी तो हादसे का मंजर क्या होगा। ये सोचकर किसी की भी रूह कांप जाएगी। आनंद विहार टर्मिनल पर सामान की जांच करने वाली एक्स-रे मशीन खराब पड़ी है। उसकी मरम्मत कराने की सुध भी रेलवे को नहीं है। ट्रेन में किन्नरों का ग्रुप घुसता है और हजारों की वसूली करके निकल जाता है और रेलवे सुरक्षा बल और राजकीय रेलवे पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर पाती है। ट्रेनों में तैनात सुरक्षा बल ऐसे मामलों में अंधे हो जाते हैं। उन्हें किन्नरों की वसूली नहीं दिखती है। इसी तरह ट्रेन में डाका डालने की घटनाओं को भी ये सुरक्षा बल नहीं रोक पाते हैं। जिसका नतीजा होता है कि दिन-ब-दिन ये घटनाएं घट रही हैं। आनंद विहार टर्मिनल पर सुविधाओं को लेकर कोई भी यात्री संतोष जरूर जताएगा, लेकिन गरीब यात्री के लिए इस टर्मिनल पर महंगाई बहुत है। इस महंगाई के चलते गरीब आदमी ट्रेन में चढ़ने के पहले सौ बार सोचता है। जब 26 मई 2014 में एनडीए की सरकार बनी। तब तमाम दावों के साथ सुरेश प्रभु को रेल मंत्री बनाया गया, लेकिन उससे रेलवे का कायापलट नहीं हुआ। उल्टा बीमार रेलवे और बीमार हो गया है। अब देखने वाली बात होगी कि नए रेल मंत्री पीयूष गोयल इस बीमार रेलवे की सेहत कितनी सुधार पाते हैं ?
Tuesday, November 28, 2017
बहुत बेरहम हैं लोग
(दिल्ली) ये उत्तरी दिल्ली की तस्वीर है। पेड़ भी सांस लेता है, लेकिन
इसकी परवाह कौन करता है? यदि परवाह करता तो ये तस्वीर न होती। प्रदूषण को लेकर दिल्ली में हाहाकार मचा है, लेकिन सरकारी लापरवाही का आलम ये है कि ऑक्सीजन देने वाले पेड़ों की लगातार कटाई जारी है। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में हरियाली नहीं है, लेकिन दिल्ली की जनसंख्या और प्रदूषण को देखते हुए पेड़ों की कटाई उचित नहीं है। जीवन देने वाले का जीवन लेना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता। बिना हरियाली के जीवन में कोई उत्साह-उमंग नहीं रह जाता। पेड़ों का साथ आदिम काल से मिलता आ रहा है। इसके महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि लोग युगों-युगों से पे़ड़ों की पूजा करते आ रहे हैं। अब ऐसे में किसी पूजनीय काया पर कुल्हाड़ी का प्रहार निंदा के लायक है।
Monday, November 20, 2017
न लोग बदले, न सिस्टम बदला
(पटना) बिहार में परिवहन सेवा का क्या हाल है, इसका अंदाजा इस तस्वीर को देखकर लगाया जा सकता है।
राजधानी के सबसे व्यस्त सड़क बेली रोड या हड़ताली मोड़ पर इस तस्वीर को खींचा गया है। ये वो इलाका है जहां सरकार के नुमाइंदे रहते हैं। ये वो जगह है जहां प्रशासन की बैठकी होती है। ये वो जगह है जहां जनता अपनी मांगों को लेकर धरना देती रही है। ये वो जगह है जहां मजदूर अपने हितों के लिए हड़ताल करते रहे हैं। ये वो जगह है जहां भूख हड़ताल या आमरण अनशन तक होता रहा है। ये वो जगह है जहां से उठी आवाज सरकार को सुननी पड़ती है, लेकिन उस पर अमल कितना होता है ये अलग मुद्दा है। ये तस्वीर गवाह है कि शासन और प्रशासन सुरक्षित यात्रा को लेकर कितना संवेदनशील है? बस की छत पर बैठे ये लोग इंसान हैं कोई सामान नहीं।बस की छत पर बैठकर यात्रा करने की इनकी मजबूरी है या शौक ? ये तो यही लोग बता सकते हैं, लेकिन उस कंडक्टर और खलासी से क्या अपेक्षा रखी जाए जो चंद पैसे कमाने के एवज में यात्रियों की जान खतरे में डाल देता है। नहीं ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। लेकिन ऐसा हो रहा है। ये तो राजधानी की तस्वीर है। बिहार के कोने-कोने में लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर यात्रा करते हैं और प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया रहता है।
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