Monday, January 15, 2018

राशि का योग, शुभ संयोग !

जब सूर्य किसी राशि में प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं। सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया है। ये जानकारी ज्योतिष के विद्वानों ने दी है, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि मकर संक्रांति के दिन को लेकर ज्योतिष के विद्वानों में मतभेद है। कई विद्वान 14 जनवरी को मकर संक्रांति बता रहे हैं तो कई विद्वानों ने 15 जनवरी को मकर संक्रांति का दिन घोषित किया है। यही बात है कि लोग मकर संक्रांति को लेकर कंफ्यूज हो गए हैं। कई लोगों ने 14 जनवरी को ही मकर संक्रांति मना लिया वहीं कई लोग 15 जनवरी को मकर संक्रांति मना रहे हैं। दान दक्षिणा देकर पुण्य कमाने का योग है। स्नान ध्यान करके लोग शुभ कार्यों की शुरुआत कर सकते हैं। यानि इस दिन खरमास खत्म हो गया। खरमास के दिन कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता है। लेकिन अब शुभ काम का दरवाजा खुल चुका है और सभी अपने-अपने कार्यों में लग गए हैं। तिल और लाई की बिक्री तेज है। बाजार इससे पटा पड़ा है। मकर संक्रांति की धूम हर जगह देखी जा रही है। लोग पतंगबाजी का लुत्फ उठा रहे हैं। बच्चों का उमंग देखते बनता है। एक बार फिर मकर संक्रांति खुशहाली और समृद्धि लेकर आई है। आइए वर्ष 2018 में इस उत्साह का स्वागत करते हैं। 

Sunday, January 14, 2018

50% की छूट का भरोसा !

Flat 50% की छूट। जी हां आधी कीमत पर आपको इस स्टोर में कोई भी सामान मिल जाएगा। ये रिलायंस का
ट्रेंड्स शोरूम है। जहां पचास प्रतिशत की छूट देने का बोर्ड लगाया गया है। रिलायंस अपने आपमें एक ब्रांड है। रिलायंस यानि भरोसा। धीरूभाई अंबानी ने जब रिलायंस की नींव रखी होगी तो उन्होंने भी इस भरोसे के साथ कंपनी की शुरूआत की होगी कि ये कंपनी आगे चलकर देश की बड़ी कंपनी बन जाएगी। कंपनी की क्या स्थिति है वो आपके सामने हैं। धीरूभाई अंबानी के दोनों बेटे मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी ने रिलायंस को और ऊंचाई देने की कोशिश की। लेकिन इस कंपनी के साथ एक सच ये भी है कि इसके शोरूम में मार्केटिंग का खेल खूब खेला जाता है। यानि गंजे को कंघी बेचने में इस कंपनी के कर्मचारी काफी माहिर हैं। अब इस शोरूम को ही देख लीजिए। 50% की छूट का बोर्ड लगाकर ग्राहकों को भरमाया जा रहा है कि वाकई रिलायंस में सस्ते दामों पर सामान मिल रहा है। लेकिन जरा सोचिए जो लोग गंजे व्यक्ति को कंघी बेच सकते हैं, क्या वो आपको पुराना प्रोडक्ट नहीं बेच सकते हैं? ये पचास प्रतिशत की सीधी छूट का मतलब निकाला जाए तो यही होगा कि या तो कंपनी का प्रोडक्ट बिक नहीं रहा है तो पचास प्रतिशत की छूट देकर बेचने की कोशिश की जा रही है या फिर प्रोडक्ट के मूल दाम में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर प्रोडक्ट का दाम बताया जा रहा है। यानि इस बढ़े हुए दाम में 50 प्रतिशत की छूट दे दी जाए तो कंपनी को फायदा होगा। छूट के बाद भी उसका प्रोडक्ट अपने मूल प्राइस में बिक जाएगा। यहां ग्राहक समझेगा कि उससे सस्ते में ब्रांडेड सामान मिल गया। यहां गौर करने वाली बात है कि दीपावली और क्रिसमस के दौरान कंपनियां टारगेट लेकर चलती हैं कि उनको बाजार में इतना सामान सेल करना है। जो सामान इन त्योहारों के दौरान नहीं बिकते, उनको बेचने के लिए कूपन रीडीम और छूट की तरकीब अपनाई जाती है। 

Saturday, January 13, 2018

मेरी आत्मा मर गई

तुमने ऐसा मारा कि मेरी आत्मा मर गई।
वक्त से पहले मेरी जिंदगी हार गई।।

बचपन को रौंद कर फख्र करते हो तुम।
जवानी का हश्र देख सिसकते हैं हम।।

कागजों पर इतिहास लिख सो जाओ तुम।
मेरी सुबह बताएगी गुनहगार हो तुम।।

अब इस जहां में जीने की चाहत नहीं रखता।
इसलिए मैं अपना दर्द किसी को नहीं देता।।

मैं कभी शराफत का नकाब नहीं ओढ़ता।
लिहाजा किसी से शिकायत नहीं करता।।




Friday, January 12, 2018

SC ने की 'जन गण मन' की बात

सिनेमा हॉल और मल्टीप्लैक्स में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्र गान जन गण मन...का बजाया जाना अनिवार्य किसने किया? ये किसके दिमाग की उपज थी? वो कौन सा तथाकथित राष्ट्रभक्त है जिसको लगा कि उसके देश के लोग राष्ट्रगान का सम्मान नहीं करते या फिर उन्हें राष्ट्रगान की जानकारी नहीं है। वो कौन  सा शख्स है जिसको लगा कि सिनेमा से जोड़ कर राष्ट्रगान को पॉपुलर बनाया जा सकता है। ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो हर भारतीय नागरिक को शर्मिंदा करते हैं। कांग्रेस के नेता और उद्योगपति नवीन जिंदल ने हर नागरिक को राष्ट्रीय तिरंगा फहराने का अधिकार दिलाया। देश का कोई भी नागरिक पूरे सम्मान और गरिमा के साथ तिरंगा लहरा सकता है। अपने घर या संस्थान में राष्ट्र ध्वज को पूरी गरिमा के साथ लगाया जा सकता है। जिंदल की ये कोशिश तारीफ के काबिल है, लेकिन माफ कीजिएगा सिनेमा हॉल में जहां हर आदमी अपने मनोरंजन के लिए पहुंच रहा है वहां आप उसके सामने राष्ट्रगान को मनोरंजनात्मक संकेत के तौर पर पेश कर रहे हो। क्या सिनेमाई पर्दा राष्ट्रगान की गरिमा की सुरक्षा कर सकता है? ज्यादातर का उत्तर नहीं में होगा। सिनेमा हॉल में बैठे दर्शक की क्या मानसिकता हो सकती है, क्या इस पर किसी भी सरकार ने सोचने के लिए वक्त निकाला है। जवाब में शायद नहीं । वरना इस पर मंथन किया  होता तो जरूर दिल और दिमाग में आता कि सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाकर उसका कितना बड़ा अपमान किया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर रायपुर के एक मल्टीप्लैक्स में फिल्म 'ऐ दिल मुश्किल' के पहले राष्ट्रगान बजाया और दिखाया जा रहा है। सभी दर्शक राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े हो जाते हैं। लेकिन अफसोस तब होता है जब राष्ट्रगान के तुरंत बाद फिल्म के शुरुआती अंश में चुंबन दृश्य दिखाया जाता है। अब आप ही सोचिए जो दर्शक राष्ट्रगान के सम्मान की मानसिकता में था अचानक उसकी मानसिकता मनोरंजन की फूहड़ता में डूब गई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले को पलटते हुए अच्छा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान को बजाना स्वैछिक कर दिया है। यानि अब सिनेमा हॉल के मालिकों को राष्ट्रगान बजाने की अऩिवार्यता नहीं रहेगी। उम्मीद है सुप्रीम कोर्ट के इस  फैसले से अब राष्ट्रगान का अपमान रुक जाएगा। 

Wednesday, January 10, 2018

जेल ब्रेक: एक छोटी सी कहानी

                                                                       (1)
सजलपुर का सेंट्रल जेल। दूर से ही जेल का विशाल आकार दिख जाता है। अब अंदर कैदी कैसे रहते होंगे। इसका आइडिया तो जेल के अंदर जाने पर ही होगा ना। जेल का अनुभव लेने टुन्ना सिंह पहुंचता है। जो अपहरण का आरोपी है। 

टुन्ना सिंह- किवाड़ खोलो भइया, हम भी आ गए तुम्हारे दर्शन को। अभी तक बाहर से ही जेल को देखते आ रहे थे, अब अंदर से भी जेल का जलवा देखेंगे। भइया ईमान से कहते हैं अंदर आकर हम भी सुधर जाएंगे। बस एक ही गुजारिश है कि सुधाने का जो-जो औजार है, उसके दर्शन जरूर करवा देना। 

पुलिस वाले टुन्ना सिंह को लेकर जेल के अंदर दाखिल हो जाते हैं।  
                                                            
                                                                        (2)

टुन्ना सिंह- बाप रे बाप, ई त भेड़-बकरी के जैसा जेल में आदमियों को ठूंस दिया है। बहुते गलत बात है। ऐसे इंसाफ दोगे। इससे से अच्छा तो ससुरा को गोली मार दो। (कुछ देर सोच कर) इतनी भीड़ देखकर ससुरा गोली की भी बोली बदल जाएगी। 
(साथ चल रहे पुलिसकर्मी से...)
टुन्ना सिंह- का...सही कह रहे हैं ना ?

(साथ में चल रहा पुलिसकर्मी कोई जवाब नहीं देता है। )

                                                                           (3)

जेल में टुन्ना सिंह को एक सिंगल कमरा मिलता है। उसमें दूसरा कोई कैदी नहीं है। 
टुन्ना सिंह- ससुरा जेल में ठूसम ठूस चल रहा है, लेकिन हमरे कमरा में साला हम ही है। कैइसा गजब का सिस्टम है भाई। चलो अकेले हरि भजन गाएंगे। 

                                                                           (4)
जेल के अंदर दो गुटों के बीच अचानक मारपीट शुरू हो जाती है। इसमें एक कैदी बुरी तरह से घायल हो जाता है। उसके शरीर से खून ज्यादा बह जाता है। उसे लेकर जेलकर्मी अस्पताल लेकर भागते हैं। अस्पताल में घायल कैदी को खून की जरूरत पड़ती है। घायल कैदी को A+ रक्त की आवश्यकता होती है। टुन्ना सिंह का भी खून A+ है। टुन्ना सिंह जेलकर्मी से बात करता है। 
टुन्ना सिंह- का भाई, हमरा भी खून A+ है, क्या हम खून दे सकते हैं?
जेलकर्मीः हां क्यों नहीं, रुको मैं जेलर साहब से बात करता हूं। 

                                                                            (5)  
जेलकर्मी जेलर के चेंबर में घुसता है। 
जेलकर्मी- सर अपहरण का एक विचाराधीन बंदी है जो अपना खून डोनेट करना चाहता है। उसके भी ब्लड का ग्रुप A+ है। इस समय मंगरु को खून की सख्त जरूरत है। 
जेलर रणविजय चौहान- तो किस बात का इंतजार कर रहे हो, उसे लेकर जल्दी अस्पताल पहुंचो ताकि समय पर उस घायल कैदी को खून मिल सके। 
जेलकर्मी- जी सर । हम जल्द ही निकलते हैं। 

                                                                             (6)
अस्पताल में मंगरु जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। उससे खून की सख्त जरूरत है। ऐन वक्त पर टुन्ना पहुंच जाता है और वो अपना खून डोनेट करता है। जिससे मंगरू की जान बच जाती है। ब्लड डोनेट करने के बाद टुन्ना सिंह जेल वापस लौट आता है। जहां उसके इस कदम की हर व्यक्ति तारीफ करता है। उसके इस कदम से जेल में उसके प्रति धारणा बदल जाती है। सब उसे नेक इंसान मानने लगते हैं।
एक कैदी- का हो टुन्ना बाबू, तुम तो मंगरु के लिए भगवान बन कर आए हो
टुन्ना- का कहत हो चाचा। इंसान इंसान के काम नहीं आएगा तो क्या जानवर आएगा। अरे भइया हम भी इंसान ही हूं। उ त अपहरण के झूठा केस में फंसा दिया है। वरना हम भी घर परिवार की देखरेख में लगे रहते।

                                                                              (7)

जेल प्रशासन कैदियों के आचरण में सुधार और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाता है। टुन्ना की पॉजीटिव इमेज को देखते हुए जेल प्रशासन उससे समोसे और पकौड़े की दुकान के काउंटर पर बिठा देता है। ये दुकान जेल प्रशासन के द्वा्रा संचालित होता है। काउंटर पर बैठते-बैठते कब एक महीना िबीत जाता है इसका पता भी नहीं चलता। जेल की चाहरदिवारी के बाहर संचालित इस दुकान पर ग्राहकों की भीड़ लगी रहती है। यानि कैदियों के द्वारा बनाए गए समोसे, पकौ

                                                                               (8)

जेल द्वा्रा संचालित दुकान पर भज्जिया और पकौड़ों की मांग बढ़ गई है। रविवार के दिन काफी संख्या में पब्लिक दुकान पर पहुंचती जा रही है। लिहाजा जेल के कई मिल-जुलकर भज्जिया और पकौड़े तलने में लगे हैं। भीड़ भज्जिया, समोसे और पकौड़े खाने में व्यस्त है। काउंटर पर कौन बैठा है इस पर किसी का ध्यान नहीं है। लेकिन जब धीरे-धीरे भीड़ घटने लगती है तो एक जेलकर्मी की नजर काउंटर पर जाती है। जहां टुन्ना सिंह गायब हो जाता है। जेलकर्मी जेलर को टुन्ना सिंह के गायब होने की सूचना देता है। जेलर को दुकान के काउंटर पर टुन्ना सिंह का लिखा एक लेटर मिलता है जिस पर लिखा होता है कि अपहरण के केस में वो जेल आया था, लेकिन आज खुद उसका ही अपहरण हो गया।